वकीलों के बैंक खाते फ्रीज नहीं किए जा सकते-इलाहाबाद हाई कोर्ट



इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि 

"वकीलों के बैंक खाते केवल संदिग्ध लेन-देन या मुवक्किल से मिली पेशेवर फीस के आधार पर पूरी तरह फ्रीज नहीं किए जा सकते। वकील को मिली प्रोफेशनल फीस को "अपराध की आय" (प्रोसीड्स ऑफ क्राइम) नहीं माना जा सकता।" 

 उत्तर प्रदेश में वकीलों से जुड़ी कानूनी कार्यवाही में इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह निर्णय काफी राहत देने वाला है।इस मामले (अवमानना/याचिका) की मुख्य पार्टियों का विवरण इस प्रकार है:

याचिकाकर्ता (Petitioner): आयुष बाजपेयी (Ayush Bajpai) जो पेशे से एक अधिवक्ता हैं।

प्रतिवादी/संबंधित अधिकारी (Respondents): उत्तर प्रदेश पुलिस की साइबर सेल और राज्य के अन्य अधिकारी।

अदालत (Bench): इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार शामिल थे।

इस महत्वपूर्ण केस से जुड़े कुछ मुख्य बिंदु ये हैं:

✒️ मामला: साइबर सेल ने फर्जी लेनदेन का हवाला देते हुए वकील आयुष बाजपेयी का पूरा बैंक खाता फ्रीज कर दिया था। वकील ने दलील दी कि उनके खाते में जमा राशि उनके मुवक्किल से मिली 'पेशेवर फीस' थी。

हाईकोर्ट की टिप्पणी: अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक वकील स्वयं किसी आपराधिक कृत्य या घोटाले में शामिल न हो, तब तक आरोपी द्वारा दी गई कानूनी फीस को केवल इस आधार पर 'अपराध की आय' (Proceeds of Crime) नहीं माना जा सकता。

आदेश: वकीलों के कामकाज में बाधा न आए और उनके खातों को मनमाने ढंग से फ्रीज न किया जाए, इसके लिए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर पुलिस की इस कार्रवाई को विनियमित करने का निर्देश दिया。

द्वारा 

शालिनी कौशिक 

एडवोकेट 

कैराना (शामली) 

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